Thursday, January 11, 2007

एक कहानी होना चाहती है ।


भीड़ से दूर बैठना और देखना कि लोग कर क्या रहे हैं, अच्छा तो सभी को लगता ही होगा। हाँ कई लोग अपने मे खोये खोये भी देखे हैं, भीड़ मे रह कर भी, भीड़ से अलग । तो खैर बात सिर्फ़ इतनी की भीड़ काफ़ी थी, अलग ही बैठा सबसे, दीवाल से लग कर एक जगह खाली दिखी सो वहीं जम गये। फ़िर उद्धेश्य भी ससुर कुछ भीड़ टापने का हो तो कहने ही क्या । कह्ते हैं कुवारों के जीवन मे कोई खास समस्या नही रहती सो खुराफ़ात कुछ ज्यादा सूझती है । इन दिनो एक कातिल, जान खाऊ खुराफ़ात अपने ऊपर भी चढी हुयी है, कहानी लिखी जाये । पर कैसे और क्या से मुश्किल है, जाने कैसे वो भवानी दादा को कदम कदम पर मिलने वाले चौराहे कहां मर गये, यहां तो नहीं दिख रही एक भी राह ।
अजीब है कहानी लिख पाना भी, कैसे भई लोग दूसरों को जिनकी जैसी जिन्दगी कभी जी नहीं, जिनको बस किनारे खड़े होकर परखा, जाना, बस देख कर साथ रह कर कैसे लिख देते हैं लोग । लिखना ही क्यों हो, डाक्टर ने बताया है क्या? कभी कभी तो लगता है कमीनापन है। कविता तो ठीक, बहुत सेफ़ तरीका है, रैंप पर आओ कम से कम कपडों मे, मटक कर उधर से इधर, फ़िर इधर से उधर, फ़ैसन है फ़ैसन, हम कहानी लिखें तो नंगे खडे हैं सड़क पर, जो आया दो तीन ढेले मार गया, हट्ट । मेहनत का मोल कहाँ, मोल है पत्थर की चमक का, पथरीली चमक ससुरी । कहानियां आती कहां से होंगी, सपने मे? धत ! यहीं आस पास देख, सुन, समझ, पढ़, सूंघ, और हाँ चख कर । अपने आस-पास और उससे कहीं ज्यादा खुद अपने को सूंघना हर कहीं गिद्ध की तरह निगाहें जमाये, बैठे रहना कमीनापन नहीं तो क्या है । "नहीं ऐसा भी नही, कल्पना भी कोई चीज है, क्या जरूरी है मुझे आम की कहानी लिखनी है तो पेड़ पर लटकना भी पड़े,और तभी आम होना समझा जा सके । कहीं कुछ देखा और फ़िर कभी किसी समय किसी बात किसी एकदम काल्पनिक घटना कह सकने के लिये उसका यूज कर लिया तो बुरायी कहां है", एक दोस्त की बात याद आती है, "सबके पास लफ़्ज नहीं होते मियां, बयां है गर तो, अन्दाज-ए-बयां कहां से लायें, वो कैसे कहें जो कहना है मेरी जान । लेखक शब्द देता है, अबोलों के मौन का मुखर बनता है, तुम समझ सकते हो कि कुछ हुआ तो उसका मतलब क्या है, हो सकता है वैसा सब नहीं समझ पाये, so it's your responcibility, to let others know whatever you think, और कुच लिखने के बाद हल्का सा नहीं पाते अपने आपको, कि जैसे बहुत कुछ लदा हुआ सा था अब उतर गया"। हां इस बात मे थोड़ा दम लगता है, अपनी कुछ लिख कर बड़ाई बटोरने, वाह वाही चाटने, को ढक सके ऐसा एक दमदार गहरा पर्दा । अगर बस स्वान्त: सुखाय, वही हल्का महसूस होना, के जैसे लोगों को कह्स्ते सुना होगा, "भैया, हम तो अपने मन कि खुसी को लिखते हैं, लिखते कहां कविता हो ही जाती है ससुरी।" ऐसा उद्धेश्य रहा होता लिखने का तो भाई लोग चार पन्ने काले करते ही छपवाने की होड़ मे ना पड़ जाते, कवी सम्मेलनों मे सुनने वालों से ज्यादा सुना देने वालों की भीड़( उत्सुक्ता,ललक ) न होती ।
"सुरसरि सम सब कंह हित होई", टाइप कुछ भी लिख पाने का कोई भरोसा किसी को होता होगा क्या? पर हां लिख कर हल्का सा तो लगता है, पर पढने का मजा भी अलग ही है । कई बार अनमने शुरु की गयी किताबें भी धर दबोचती हैं और हां ऐसा ही नही कि कुछ अपने आस पास का लिखा मिले तभी ऐसा हो । पर फ़िर भी लेखक कम कमीने नही लगते, किसी दिन पात्र जिन्दा हो जायें तो चुन चुन कर बद्ला लें । असल जिन्दगी के लोग डर डर कर रहते होंगे लेखकों से कि ना जाने ससुर कब सनक जाये और साला लिख मारे हमारे उपर ही कुछ अन्ट सन्ट, नंगे की खुद इज्जत क्या, नंगा खुदा से चंगा । बाणभट्ट को तो द्विवेदी जी ने बाकायादे चेता दिया उपंयास की बस शुरुआत मे ही, कि बेटा १०० दिन बाद मर जाओगे अगर किसी जिन्दा इंसान की कहानी कविता कुछ भी लिखोगे......ऐसा वैसा लिखा तो वो इन्सान ही नहीं जीने देगा । वैसे हिन्दी मे लिख दो पढ़ते ही बहुत कम लोग हैं, सिकोरिटी है अभी इसमे काफ़ी, अरे हिन्दी साहित्य है कोई हिन्दी पिक्चर थोड़े ही है।
मेरे आस पास क्या हो रहा है, है क्या कोई कहानी ? अंग्रेजी मे हिन्दी बोलता एयरपोर्ट बकबकिया सी आवाज आ रही है,"spice jet आपको ये सूचित करते हैं कि डेल्ही से हैडराबाद जाने वाली उडान संख्या SG-221, ४ घन्टे विलम्ब से जाएगी, अब ये flight भारतीये समयनुसार ८ बजे जाएगी, आप्को हुयी असुविधा के लिये हमें खेद है, धन्यवाद । Spice jet announces delay in it's flight SG-221 from delhi to hyderabad by 4 hours, now this will go at 20 hundered hours that is 8PM by indian time, we regret any inconvenience caused. " एनी इन्कंवीनिएस, स्याले....मैं नही बगल मे बैठे टोपी वाले अंकल बोलते हैं ।
"सुन नयन आज नये साल पर एक बात बताता हूं, ध्यान से सुनियो, फ़िर कोई बताये ना बताये। यार भगवान जब भी देता है, पूरा फ़ाड़ देता है, छप्पर।"
"बावला हो गिया है क्या, क्या बक रिया है?"
"अरे यार कल की कैंसिल हो गयी थी, आज साली ४ घन्टे लेट है, इसकी मां..."
"हे हे हे हे हे, हा हा हा हा.. ए हे हे हे हे, लग गयी साले तेरी तो", फोन पर भी नयन फ़ूट फ़ूट कर हंसता है, "पर कोई नहीं टूरिस्ट टापो, गोवा जाने वाली गोवने नहीं हैं क्या वहां, आप तो साब लेखक हो रिये हो आज कल, लिख मारो कोई कहानी, किसी गोवन के नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहे म्रदुल अधखुले अंग पर?"
"नये साल पर मैं ही मिला हूं तेरा जोय शंकर पाठ पधने के लिये, अच्छा रखता हूं साले, रोमिंग पर हूं ।"
"चल कट ले ।"
मैं गम्भीर नागरिक हूं, उससे कहीं ज्यादा, गंभीर लेखक सो अपने आस पास कहानियों की खोज करता हूं । आस पास कुछ फ़ुटकर कहानियां थोक में बिखरी हुयी दिख रही हैं, एक एक कर बताता चलता हूं ।

कहानी जाड़ों मे भी न जड़ाने वाली हसीना की

(शेष आगे.....)

5 comments:

श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' said...

ये भी एक कहानी थी क्या ?

nrohilla said...

आपकी इस कहानी नें तो पदुमलाल पुन्नालाल मुन्शीजी के लेख "क्या लिखूं" की याद ताजा कर दी है |

साभार,

nrohilla said...

मन में विस्मय हो रहा है कि वे मुन्शीजी थे अथवा बक्शीजी???

प्रत्यक्षा said...

वाह , भूमिका लाजवाब ! अब आगे ?

प्रभाकर पाण्डेय said...

शुरुआत बहुत अच्छी है, मान्यवर ।

बधाई ।।।