Monday, January 22, 2007

हे महाप्राण !




मुझसे निराला की एक कविता नहीं पढी गयी । ये जानते हुये भी की हिंदी के बड़े कवि थे । बस एक बचपन मे पांचवें की हिंदी की किताब मे सरस्वती वंदना के तौर पर लिखी, 'वर दे वीणा वादिनी वर दे', वो और हां वो 'वह तोड़ती पत्थर' । पर एक और बात की शुरुआत मे भली भली सी दिखने वाली ये कवितायें अंत तक आते आते भयावह हो जाती थीं, और हम यही मनाते थे कि इंम्तिहान मे ये न आवे बस । निराला एक विशेष पाठकीय अनुशासन की मांग करते थे, जो था नहीं । और फ़िर हिंदी से जैसे तैसे पल्ला छूड़्वा ही लिया । उनकी कवितायें निराला पार्क मे लगी उनकी प्रतिमा (सर भर था और बाकी नीचे वही सब जो यहां मिल सकता है), हां तो उनकी प्रतिमा के इर्द गिर्द खेलते हुये हमने ये जरूर सुना था की, बड़े कवि थे, और आज कहने मे कोइ झिझक भी नहीं कि कई बार मिलान भी किया था, खेल कूद कर थक चुकने के बाद कि, क्या इन्होने ही वर दे वीणा वादिनि वर दे लिखी होगी कभी, लिखी तो हिंदी मे कविता लिखी ही क्यों ?

उन्नाव शहर (जहां गढाकोला है, निराला का पैत्रक गांव और जहां कचौड़ी गली है, निराला जहां रहा करते थे) मे दो-तीन जगह निराला मिल ही जाते है, आज भी । निराला पार्क मे निराला, कचॊड़ी गली के सामने(मूर्ति अनावरण के इंतजार में) निराला, निराला प्रेक्षाग्रह के मैदान मे बुत बने निराला और राजकीय पुस्तकालय मे घुसते ही सामने खड़े दढियल और लम्बे बालों वाले निराला । इसके अलावा निराला और कहीं मिल जायें तो इसे मात्र एक संयोग कहा जायेगा, लेखक की इस जानकारी पर कोई खास गारंटी नहीं ।
हां एक और बुत था जिसे हम कफ़ी समय तक निराला का ही समझते रहे, कई सालों तक उसका बोरका नहीं उतरा तो तांक झांक कर देखते रहे, फ़िर जब "सह धूप घाम पानी पत्थर", चल नहीं पाया बेचारा बोरका तो नीचे लगे पत्थर ने राज़ खोला कि थे तो निराला ही पर अब कहे कोई माई का लाल कि कॊन है, तो पुरे १०० रुपये का पत्ता इनाम ।

अरे हां एक महाविद्यालय है, नाम भले ही कुछ हो, हम उसे बस "निराला" नाम से जानते हैं, जिसकी महिमा ये कि परीक्षा काल मे "बैच बैच" का दारुण क्रन्दन सुन आंसुओं से झीलें, ताल, तलैया नहीं भरते वरन पुस्तकों से झॊवे भर जाते हैं । जो पाठक ना जानते हों उनके लिये, झॊवा अर्थात एक विशेष प्रकार का लकड़ी का टोकरा, जिनका मुख्यत: प्रयोग गोबर ढोने मे किया जाता है । इसका अर्थ कदापि यह न लगायें कि कदाचित गोबर कम हो गया, उन्नव सहर मे सो किताबें ढोई जा रहीं । अस्सल बात ये कि "निराला" विद्यालय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (ये इसलिये लिखा की पाठक जान सकें कि लेखक पूरा नाम भी जानता है, कोई कच्चा, नौसिखिया नहीं है) की भांति "आम जनता के हित" की सोंच प्रति वर्ष ढेड़-दो सॊ स्नातक और परास्नातक पैदा करने हेतु कटिबद्ध है ।

निराला उपेक्षित नहीं हैं, हर साल बसंत पंचमी के अगले दिन का अखबार उन्नाव के पन्ने पर किनारे किसी ना किसी गोष्ठी की खबर छापता जरूर है । इतिहास बेदम कर देता है, खुद को पढा-पढा कर भी और अपेक्षाओं से भी, और उपर से तुर्रा ये कि "सीख हम बीते युगों से नये युग का करें स्वागत" । क्यों भाई ऐसा क्या धरा है कि बीते युगों से ही सीखा जाये.....निराला कचॊड़ी गली मे भटकते पाये जाते थे, आज भी उधरिच कहीं पड़े होंगे ।

हे निराला आप भाग्यशाली हैं कि कम से कम अखबार का एक कोना तो आपकॊ नसीब है । उसी कचॊड़ी गली की तरह गलियां और गढाकोला की तरह जाने कितने गांव उन्नाव ही नहीं भारत मे ऐसे भी हैं जहां रोज कोई ना कोई निराला और उसकी सरोज अंजान मर जाने के लिये अभिशप्त है । रोज कोई परिमल और रोज कोई सरोज स्मृति घुट रही है । क्यों ? हे महाप्राण, मेरे पास आज इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं कि हिंदी बोलने वाले हिंदी पढते क्यों नहीं, और क्यो पढे अगर हिंदी बाजार से लड़ नहीं पा रही ? महाप्राण क्षमा करें मैं जो खुद को आपके शहर उन्नाव का कह्ता हूं, पर यह बस खोखले गर्व की बात भर है मेरे लिये । मैं आज का युवा हूं, आज तक आपकी कवितायें नहीं पढ सका हूं, और पढूंगा भी तो समझ पाऊंगा कोई भरोसा नहीं, हे आम जनता के कवि मुझे खुद को बाजार मे आगे देखना है, तुम्हे पढ्कर कोई फ़ायदा नहीं । हां तुम बुत बने खडे रहना घर आऊंगा तो तुम्हे देख प्रणाम तो करूंगा ही.....

4 comments:

मनीष...Manish said...

हिन्दी की पाठ्य पुस्तक को छोड़ निराला को मैंने भी नहीं पढ़ा । शायद ये इसलिए भी था कि उस वक्त दिनकर,बच्चन, गुप्त, हरिऔध की कविताएँ ही मन को ज्यादा खींचती थीं ।
निराला की जन्म भूमि के आज के हालात से रूबरू करने का शुक्रिया !

Divine India said...

सच है दोस्त लेकिन कितने हैं जो जानते हुए भी इअन जैसे कवियों की किताबों को पढ़ने का प्रयास करते हैं,ब्लाग की दुनियाँ ही को लो लोग सब कुछ लिखते हैं जो सुबह अखबार में आता है,पर साहित्य की पुछें तो सब मौन हैं जबकि हमें कुछ कदम उठाना चाहिए…हम कह रहे हैं कि हम हिंदी के संरक्षक हैं पर यह कोई बात नहीं है…हमें लिपि नहीं भाषा को समृध करना होगा…धन्यवाद।

manya said...

Sach kahun to nirala ki yahi ek do kavitayen maine bhi padhi hain.. aur jis tarah tumne aaj ke haalaton aur upekshit hindi kaarnan kiya h wo sarahniya hai.. bahut simple tarike se sidhi aur chubhti baat kahi hai.. par hame kuchh karna bhi chahiye iske liye..logon ko hindi ki taraf aakarshit karne ke liye aaj ki pidhi ko ladna hoga.. hindi khud kaise ladegi use to hamen jeevant karna hai.. hindi bahut udaar bhasha hai aur ise smirdhishaali banane ka darmodaar ham sab par hai.

Seema Kumar said...

'निराला' के शहर ने हिन्दी प्रेम कुछ तो दिया है, है न ? अच्छा लिखा है ।

"हिंदी बोलने वाले हिंदी पढते क्यों नहीं, और क्यो पढे अगर हिंदी बाजार से लड़ नहीं पा रही ?"
हिंदी से बेहद लगाव होते हुए भी पाठ्यक्रम की हिन्दी किताबों के अलावा मैंने न के बराबर किताबें पढी़ हैं हिन्दी में । मुख्य कारण यह है - हिन्दी की अच्छी, रूचिकर और समझ सकने वाली साहित्य की सरल उपलब्धता न होना । पढ़ना चाहती भी थी तो मिलती नहीं थी आसानी से किताबें । पढ़ने का शौक बचपन से पनपता है .. और साहित्य उम्र के अनुकूल और रूचिकर होना चहिए .. 'कामिक्स' तो मिल भी जाते थे पर साहित्य नहीं ।

जब हम दो भाषाएँ (हिन्दी और अँग्रेजी) बचपन से साथ सीख रहे हों, तो स्वाभाविक है हम अच्छी और रूचिकर चीजें पढ़ना चाहेंगे - चाहे जिस भाषा में मिले । साहित्य मन को छूती है, अंतर की भूख के लिए होती है .. शायद इसी लिये भाषा बेमानी हो जाता है .. वैसे ही जैसे संगीत की कोई भाषा नहीं होती (गीत की भले ही हो) ।

मैं इस टिप्पणी से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ कि "हमें लिपि नहीं भाषा को समृध करना होगा… " । दोनों को करना होगा क्योंकि दोनो एक दूसरे के पूरक हैं । और साहित्य के लिए लिपि आवश्यक है । और एक प्रश्न तो यह भी है कि आज हम बात चाहे कर भी लें हिन्दी में, क्या पढ़ते, लिखते या काम करते हैं हिन्दी में ? नहीं करेंगे तो भाषा तो सिकुड़ती जाएगी, समाप्त होती जाएगी .. जीवंत कैसे रहेगी ?

यह टिप्प्णी तो पूरा चिठ्ठा बनती जा रही है ... शायद अपने चिठ्ठे पर भी लिख डालूँ । बहुत विचारणीय और तर्क वाला विषय है ।