Monday, January 15, 2007

मटमैला बचपन




सर्दी की रात
एक पतली शर्ट
साहबों की मार और गालियां
उनकी जूठन के साथ खा
नंगे पांव
आंखें मिचमिचा
दांत किटकिटा
नाक पोंछ
शायद यही कह रहा था
मैं हूं तुम्हारे
महान देश का भविष्य

आओ और मुझे
छाप दो
साल का श्रेष्ठ चित्र बनाकर
लिखो मुझपर
भावुक कविता
फ़िर छोंड़ दो
जी जी कर मरने के लिये

...रवीन्द्र

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