Friday, January 19, 2007

एक कहानी होना चाहती है । - भाग २


(पेश-ए-खिदमत है ये बचा खुचा भाग, जो हो सकता पहले भाग से कहीं से भी जुड़ा न लगे, मेरी भुलक्कड़ लेखनी जिम्मेदार है....मुआफ़ी चाहूंगा)

कहानी जाड़ों मे भी न जड़ाने वाली हसीना की

जाड़ों मे भी न जड़ाने वाली हसीना कल रात थी । यहीं एयर्पोट, ३ डिग्री टेम्परेचर, सर पर गुलदान, चित्तीदार चश्मा, जैकेट कम फ़तुही ज्यादा, घुटनो की गोलायी से बस बलिश्त भर दूरी तक उटंगी जींस, बाकि ज़मीन तक, मेरी, औटो, टैक्सी और साथ खड़े अंकलों की चिपकी आंखें चिपकाये । बहरहाल बावारी नजरों का एक गैर जरूरी हिस्सा, अंशदान स्वरूप, उसके झुकने से पैदा की गयी, उठते टाँप, गिरती जींस के बीच किसी "कुछ" की सम्भावना पर भी, भरपूर । वैसे संभावनायें अंदर Air hostess की काफ़ी दूरी तक ऊपर की ओर खुली हुई स्कर्ट मे भी बस मुझे ही नहीं मिली होगी, ऐसा ख़याल है । फ़िर हुआ कुछ यूं की, खुदा मेहरबान तो गधा भी पेलवान । "आर यू आलसो गोइंग........ नोयडा", अब तो नोयडा ना भी जाना हो तो, "नो" ना निकले । आटो शेयर हुआ और रास्ते की हैरानी जाड़ों मे ना जड़ाने वाली हसीना के कुछ कुछ बहुत कुछ दिखते से परे, उसकी बच्चों सी हंसी पर ज्यादा । बच्चों की हंसी का कोइ कारण होता हो सकता क्या ?

कहानी लटकटे झोले झुकती कमरों की

झोला लटका था, कमरें झुकी थी, एक नहीं दो दो । एक झुकी कमर के हाथ मे झोला, कमर झुकाता, कदम लड़खड़वाता ही चला जा रहा था कि दूसरी झुकती कमर ने झोला छीन सा लिया और कुछ देर उठा खुद लड़खड़ाने लगी । फ़िर, वहीं एयर्पोर्ट की दीवाल से लगी सीट पर बैठे , भीड़ से दूर, भीड़ मे कहानी खोजते दिखा कि अब दोनो कमरें बराबर, नार्मल लड़खड़ा रही थीं, झोला लटक नहीं रहा था, सधा, दोनो कमरों के हाथों मे । एक बध्धी-एक कमर वाली का हाथ, दूसरी बध्धी-दूसरी कमर वाले का हाथ । बूढे के गालों पर, बुढिया की आंखों मे हंसी थी, बस ।

कहानी फ़ेंकी किताब और इडीयट बच्चे की

वो जो उसकी माँ सी ही लग रही है, कहती है "ईडियट", और वो, उसके हांथों से किताब, छीन, जमीन पर फ़ेंक विरोध जताता है । वह उधर कहीं भाग जाता है, वह वहीं बैठी रहती है, थोठी देर किताब घूरती है, जैसे, "भाग गये उस इडियट" का कोइ हिस्सा उस किताब मे अभी भी है । हाथ झुक कर किताब बैग मे रख देते हैं, पर आंखें अभी भी "ईडियट" से गुस्से मे ही हैं, ढूंढ भी "ईडियट" को ही रही हैं । १० मिनट बाद आंखें, टांगों को सीधा करती हैं, और दूर तक "ईडियट" को देखती हैं, इधर-उधर, फ़िर से टांगों को टेढ़ा होने देती हैं, वापस कुर्सी पर । अब वही आखें ये झुठलाने कि पूरी कोशिश मे हैं, की उन्होने ही टांगों को सीधा करवाया था, कारण.... शायद ये कि "ईडियट" भीड़ से अलग गिफ़्टस की दुकान पर दिख गया ।

कहानी चिड़िया उड़, चमकती आंखों और बात की

नयी शादी हुयी हो और कोई इसे समझ ले बस देख कर, कोई खास बात नहीं । इस नियम से यह सिद्ध हुआ कि, मैंने कुछ खास नहीं किया, मुझे तो खैर वो दिखे ही नहीं, उसका उसके मोटे (मजबूत और मांसल भी गलत शब्द नहीं) कंधे पर धीरे-धीरे, प्यार में, फ़िरता मेहंदी लगा हाथ भी दिखा, तब तो क्या ही कोई बात हो सकती है । बच्चे जब Flight लेट हो तो चिड़िया उड़ खेलें इसमे भी क्या बात । हां पर, चिड़ियां उड़ मे बकरी के उड़ जाने के बाद, हाथ जोड़ मार खाती बहन के हाथ बचाने के तरीकों को देख, मेरी कहानी खोजू आंखों को मेहंदी लगी आँखें अगर हंसता देखें, कंधा सहलाता हाथ दो पल रुक जाये, और फ़िर खुद भी, आंखें चार हों हंसने लगें, क्या तब भी कोई बात नहीं ?

ऐसी फ़ुटकर और निहायत ही फ़र्जी कहानियां देख, कहानी और नया साल की बात नयन से सुनते ही मैं चौकन्ना हो जाता हूं । सुधीर से फोन पर हुयी बात याद आती है, अभी कुछ दिन पहले ।

"यार सोंच रहा हूं, एक कहानी नये साल पर लिखी जाये ।"
"हां हां लिखो लिखो..तो ?"
"तू बता, तू क्या सोंचता है, कैसी होनी चाहिये नये साल की कहानी ।"
"मैं क्या बताऊ यार, तू लिख लेता है, तू लिख यार, मैं क्या बता सकता हुं ।"
"अच्छा मैने सोंचा है कुछ, सुनाऊं ?"
"सुना ले भईये"
"देख, कहानी ये है की दो-तीन लौन्डे हैं, एक अपार्टमेंट मे रहते हैं, न्यू इयर पार्टी मे जा रहे हैं, ३१ दिसम्बर की रात ..."
"हूं, अपने ही आस पास की लिखोगे साले, फ़िर...."
"निकलते है बाहर तो बगल के घर से एक बुढ़ढ़े के रोने की आवाजें आ रही हैं, पता करते है तो बुढ़्ढे अंकल बताते हैं की, बेटा अमरीका मे है, और बुढिया बीमार है । अपने अल्लाह के बंदों मे से एक की गर्ल फ़्रेंड का बार बार काल आ रहा है, "कहां हो, कहां तक पहुंचे", उसका कुछ खास मन भी नहीं बुढ़्ढों के पचड़े मे पड़ने का । पर फ़िर भी बंदे पार्टी छोंड़ कर बुढ़िया को हास्पिटल पहुंचाते हैं, गर्ल फ़्रेंड वाला बंदा तो पूरे मन से रात भर बुढिया की तीमारदारी करता रहता हैं ये जान कर भी कि निधी नाराज हो चुकी है, और भाई लोग समझ जाते हैं की सच्ची न्यू इयर पार्टी क्या है ।",
उधर से थकी सी आवाज आती है, "क्या बे ये भी कोई कहानी हुई ?"
"हा बे सोंचा तो यही था, पर कहो तो अपने अल्लाह के बन्दों को पार्टी मे भेज दिया जाये"
मेरा इतना बोलना था कि, सुधीर खुद शुरु हो गया......
"और हां फ़िर हो भी क्या सकता है साले, बुढिया रात की बीमारी में मर जाती है, लौंडे लौट कर आते हैं और पछताते है, कि साला थोड़ी देर से चले गये होते तो बुढिया बच गयी होती । साले कलाकार की दुम, इससे ज्यादा और क्या सोंचेगा तू..... अच्छा तेरी अकल मे ये नहीं आया की, अंकल ही क्यों नही चले गये डाँक्टर बुलाने या काल ही कर ली होती हाँस्पिटल ?"
"हां बे ये बात तो सोंची ही नहीं, कोई नहीं, टांगें तोड़ दें उनकी, कहो तो लकवा मरवा देता हूं, ये भी कम लगे तो अंधा कर दूं । गायब ही ना कर दूं सीण से, केवल बुढिया को रखा जाये ।"
"नहीं बे बहुत नाटक हो जायेगा,.... हां ये कर सकता है की अंधी बुढिया बीमार हुयी तो अंकल किसी को बुलाने बाहर की ओर चले और फ़िसल कर गिर गये, पैर की हड्डी टूट गयी, अब ना वो चल सकते हैं न और कुछ कर सकते हैं सो रो रहे हैं और बुढिया तो बुखार मे मर ही रही है ।"
"साले.... ये किस एंगल से नाटक नहीं लग रहा है ?...."
इस सारी कहानी के नाटक सबित होने के गम ने १ मिनट की चुप्पी रही और इस बार सुधीर फ़िर शुरू हुआ ।
"अच्छा ये सुन,पुरानी कहानी से लौन्डों को काटो, एक बुढ्ढा एक बुढिया एक घर । बाकी कोई नहीं, रात आया एक चोर । कीमती सामान ढूंढने के बीच तिजोरी जैसी चीज मे चिठ्ठियां पाता है, दो, सुसाइड नोट, बुढ्ढे और बुढ़िया के अलग-अलग, दोनो जिन्दगी से परेशान एक दुसरे के नाम से चिठ्ठी छोंड़ कर मर रहे हैं, अलग अलग कमरों मे, ये बिना जाने के दुसरा भी मर रहा है।"
"सही बे सही.... पर माँ के..... नया साल किधर कू गया रे ?"
"ऎं.... नया साल, अच्छा हां कहानी तो उसी पर है, रुक-रुक सोंचने तो दे।"
थोड़ी देर की चुप्पी, सुधीर फ़िर शुरु हुआ .... "देख अभी मरे थोड़े ही हैं बूढा और बुढ़िया, पर चोर एक बार देख कर यही सोंचता है कि मर गये साले दोनो । चोर पहले पैसा ढूंढ़ता है, माल जेवर बहुत मिला, कटने की सोंचता है, और हाँ कहानी सुनायेगा, यही अपना ००७ जेम्स चोर । उसके अपने घर की हालत खराब है, गांव भी पैसा भेजना है, बीवी की फ़टी साड़ी और बच्चों के नंगे तन, उनका कबाड़ बीनना ये सब बार-बार दिखा, याद दिला । पर साब, आखीर मे साँच को आँच क्या, पैसा लेकर भागते हुये एक बार फ़िर नज़र पड जाती है बुढिया पर और चोर अपणे इन्साण होणे के फ़रज को निभाये है, हास्पिटल पहुंचा कर पैसे वैसे दे कर कट लेवे है, भारी सा , संतुष्ट सा मण लिये...हें हें हें हें । हां थोडी लास्ट मे फ़टका मार दे पोलिश कर दे.....देख ऐसा कुछ लिखियो...., हास्पिटल के बाहर निकलते ही आसमान में तारों की चमक बढ़ जाती है, एक सितारा फ़ट सा पड़ता है उसके ऊपर और छिटक कर हर कहीं सितारे ही सितारे, नया साल आ गया....आसमान मे आतिशबाजियॊं से लिखा, हास्पिटल के गार्ड से पढ़वाता है, उसे भी जेम्स की तरह पढ़ना कहां आता पर वो जानता है की ये नये साल के आने की खुशी है ।"
"जबरदस्त बे जबरदस्त....तु लिखना शुरु कर दे मेरे भाई ।"
"तू ही लिख भाई, जब लिख जाये पढाईयो एक बार, देखें तो साला, अपना स्क्रिप्ट अपना आईडिया लिखा हुआ कैसा लगता है ।"
अभी तक तो लिखी नहीं सुधीर कि कहानी पर यहां दिल्ली एयरपोर्ट पर अपने एयरक्राफ़्ट का इन्तजार करते हुये लगता है कि क्या कूड़ा कहानी है ? सिम्मी की बात याद आती है, जो इसे सुनने पर पूरे गुस्से मे फ़ट पड़ी थी, "नये साल का मतलब समझने भर के लिये किसी के सुसाइड नोट तक लिखने की जरूरत पड़ गयी वाह रे लेखक, नये साल की कहानी मे ...खैर । और क्या चूतियापा है के कोई ऐसा चोर होगा जो पैसे छोंड़ किसी को हास्पिटल पहुंचायेगा । फ़ालतू आदर्शवाद क्यॊं घुस आता है, बार बार, क्यों नहीं वो कहानी हो जो सच भी हो सकती हो, जो सच होती हो, जो आस पास हुयी हो, सकती हो, मसाला इतना जरूरी है क्या, भागना क्यों चाहते हो... सच्चाई से । लिखना मुझे नहीं आता पर कला या साहित्य रचना भगोड़ा बनने का नाम तो नहीं होता होगा ।"
सिम्मी का लेक्चर एक तरफ़ और अपनी कहानी लिखने की तड़प दुसरी तरफ़, और कहना ही क्या की, पलड़ा इसी का भारी । सो कहानी की खोज अब भी जारी है ।
पर फ़िर सोंचता हूं, इस दिल्ली एयरपोर्ट पर कल कैंसल हो चुकी और अब लेटातिलेट फ़्लाइटस का इंतजार करते टूरिस्टस के बीच नयन के कहे मुताबिक जगहों पर नजर चिपकाये रहने मे, उस सर पर गुलदान लिये, जाड़े मे भी ना जड़ाने वाली लड़्की के छोटे कपड़ों, तेज-मस्त हंसी मे, उस बच्चे के "ईड़ियट" होने मे, बूढे और बुढ़िया का झोले का बोझ साथ मिलकर उठाने मे, शायद उस Air hostess की काफ़ी दूरी तक ऊपर की ओर खुली हुई स्कर्ट मे, चिड़िया उड़ खेलते बच्चों की हंसी मे और हां, हर बात-बेबात नयी नवेली की मेरे साथ अनजानी सी ही सही पर साथ की हंसी मे कहानी है । कहानी है, कहां नहीं । हां, इन सबके होते भी नये साल की कहानी मे किसी को लकवा मरवाने, किसी की हड्डी तुड़वाने, किसी को जान से मार देने या सुसाइड नोट पढ़कर ही जेम्स की इन्सानियत जगाने की जरुरत है क्या.... ?

1 comment:

प्रभाकर पाण्डेय said...

भारतीयजी,
नमस्कार,
मेरे ब्लाग पर टिप्पणी करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । मैं देवरिया का ही रहनेवाला हूँ और यहीं की मिट्टी में पला-बड़ा हूँ । मैं यहाँ के रग-रग से परिचित हूँ । अभी तो यह एक शुरुआत है ।
आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं । आपका ब्लाग पढ़ा ।
कृपया अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें । बहुत-बहुत धन्यबाद ।
-प्रभाकर पाण्डेय